भोपाल से निकलने वाली मीडिया की त्रैमासिक पत्रिका 'मीडिया विमर्श' के सिनेमा विशेषांक में प्रकाशित
आज भारतीय सिने संसार सिनेमा के सौ साल का उत्सव मना रहा है। पत्र, पत्रिकाएँ व सभी चैनल्स सिनेमामय हो गए हैं । भारतीय सिनेमा जगत फिल्म निर्माण के मामले मे पूरी दुनिया को पीछे छोड़ चुका है । एक ऐसे समय में जब सिनेमा का इतने बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ है। राष्ट्रीय जीवन तथा पूरी दुनिया में भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में इसकी भूमिका को नकारना असंभव हो गया है। यह विडंबना ही है कि अधिकांश बुद्धजीवी और संस्कृतिकर्मी वर्तमान की अपेक्षा सिनेमा के पिछले कुछ दौर को ज्यादा सुकून भरे नजरिए से देखते हैं।
आज भारतीय सिने संसार सिनेमा के सौ साल का उत्सव मना रहा है। पत्र, पत्रिकाएँ व सभी चैनल्स सिनेमामय हो गए हैं । भारतीय सिनेमा जगत फिल्म निर्माण के मामले मे पूरी दुनिया को पीछे छोड़ चुका है । एक ऐसे समय में जब सिनेमा का इतने बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ है। राष्ट्रीय जीवन तथा पूरी दुनिया में भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में इसकी भूमिका को नकारना असंभव हो गया है। यह विडंबना ही है कि अधिकांश बुद्धजीवी और संस्कृतिकर्मी वर्तमान की अपेक्षा सिनेमा के पिछले कुछ दौर को ज्यादा सुकून भरे नजरिए से देखते हैं।
सिनेमा की शुरुआत के कुछ ही दशक बाद लोगों ने इसे समाज का
आईना कहना शुरू कर दिया। यह बात एक हद तक सही भी थी। जिस तरह से फिल्मों ने
रूढ़िवादी समाज में परिवर्तन लाने,
जनचेतना को जागृत करने तथा सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों को स्थापित करने में प्रमुख
भूमिका अदा की उसने सिनेमा को हमारे सामाजिक व्यवहार का एक अपरिहार्य अंग बना दिया।
लेकिन आज पूरी की पूरी सिनेमा इंडस्ट्री एक ऐसे विषचक्र में फंसी है जहां पूंजी के
लोभ में सरोकार पीछे छूटता जा रहा है। फिल्मों से गंभीर सामाजिक व सांस्कृतिक बहस कम
होते जा रहे हैं। आज सिनेमा समाज का आईना नहीं बल्कि आईने के पीछे का वह हिस्सा बन
गया है जहां कुछ दिखता ही नही। ऐसे में सिनेमा की पाठशाला से सीख लेनी चाहिए जिसने
सिनेमा को देखने की एक नई दृष्टि प्रदान की। जहां सीखने को बहुत कुछ मिलता है। यहाँ
हम जिक्र कर रहे हैं महान भारतीय फ़िल्मकार सत्यजित राय की। जिसकी चर्चा के बिना यह
सिनेमाई सफर अधूरा सा लगता है। दुनिया के महान फिल्म हस्ताक्षर अकिरा कुरोसवा ने
कहा कि “सत्यजित राय के बिना सिनेमा जगत
वैसा ही है, जैसे सूरज चाँद के बिना आसमान।”
पचास के दशक में भाषाई आधार पर भारत में राज्यों का
पुनर्गठन हो रहा था। उसी दौर में भारतीय सिनेमा भी एक नये स्वरूप में सामने आ रहा
था। सत्यजित राय ने एक क्षेत्रीय भाषा में
फिल्म पाथेर पांचाली बनायी। भारतीय सिनेमा को उसकी संपूर्णता के साथ, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों तक
पहुंचाकर प्रादेशिक अथवा आंचलिक भाषाओं में भी इस जनकला माध्यम को अपनाए जाने की बेचैनी
पैदा कर दी। हिंदी सिनेमा उद्योग में भी फिल्म की कहानी और ट्रीटमेंट को लेकर एक
जोरदार बहस छिड़ गई। जिसने भारतीय सिनेमा में एक नई धारा को जन्म दिया। जिसे समानांतर
सिनेमा के नाम से जाना गया। हालांकि सत्यजित राय के पहले 1953 में विमल राय ने सिनेमा
में यथार्थ दृष्टि की दस्तक दी थी। यद्यपि इसे मुखर और धारदार बनाने का काम सत्यजित
राय ने ही किया।
साहित्य और सिनेमा की अविस्मरणीय विभूति सत्यजित राय लेखक, चित्रकार, इतिहासकर
और कलाकार होने के साथ-साथ भारतीय समाज के अध्येता और विश्लेषक भी थे। राय ने
फिल्म दर फिल्म भारतीय समाज के गुण-दोष की दृष्टि से हर एक पक्ष और उनसे उत्पन्न
होने वाली प्रभुता प्रथा की छान-बीन की है। उन्होने अपनी फिल्मों में बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार जैसी तात्कालिक समस्या हो या
समाज में स्त्रियों की स्थिति का प्रश्न, उन सभी सामाजिक
पहलुओं का चित्रण किया है जो समाज में अभिशाप थीं। राय ने अपनी फिल्मों में मानवीय
मूल्यों के गिरते स्तर को बखूबी दिखाया है। जो समाज के लिए आईना प्रतीत होती है। विशेषकता
की तरफ गहरा सम्मान, अंदरूनी विविधता की पहचान और विशुद्ध
संचार की जरूरत सब राय की दृष्टि में शामिल है।
सत्यजित राय एक स्थापित लेखक भी थे। साहित्य में उनकी गहरी
रुचि थी। उनका जन्म कला और साहित्य जगत के एक समृद्ध परिवार में हुआ था। अपने समय
के विद्वान भाषाविद तथा गीतकार और संगीतकर रमाकांत राय, संस्कृत, बांग्ला, फारसी विद्वान और प्रागितिशील विचारों के संवाहक श्यामसुंदर राय, बासुरी वादक और संगीत की गहरी समझ रखने वाले सत्यजित राय के पितामह
उपेंद्र किशोर चौधरी व चित्रकार, रचनाकर तथा सत्यजित राय के
पिता सुकुमार राय का उन्हें सानिध्य मिलना इस बात की पुष्टि करता है कि कला और
साहित्य में उनकी रुचि स्वाभाविक थी जो उन्हे विरासत में मिली थी।
यह दुखद बात है कि राय के बाल्यकाल के दौरान उनकी पारिवारिक
स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। बचपन में ही पिता जी चल बसे। माँ को विधवा आश्रम में
नौकरी कर घर का खर्च चलना पड़ा। कुछ समय बाद मजबूरन माँ को इन्हें लेकर ननिहाल जाना
पड़ा। यहाँ स्थिति काफी संपन्न थी। राय को शिक्षा का एक अनुकूल माहौल मिला। इनके
मामा का परिवार भी नाटक और फिल्म से जुड़ा हुआ था। परिवार में संगीत की एक लंबी
परंपरा थी। अतः इन सबका सत्यजित राय के
जीवन पर व्यापक असर पड़ा। जो आगे चलकर इनकी फिल्मों में और मुखर होकर सामने आई। यही
वजह है कि राय की फिल्मों का विश्लेषणात्मक तरीका, कम शब्दों में उपयुक्त अर्थों के साथ हर घटना को प्रस्तुत
करने की क्षमता उनकी हर फिल्म में स्पष्ट रूप में दिखाई देती है। उन्होने सिनेमा
के हर क्षेत्र में अपनी योग्यता का लोहा मनवाया है।
राय ने अपनी कई फिल्में साहित्यिक कृतियों पर बनाई हैं।
जहां सर्वोत्तम जीवन यथार्थ की कुंजी है। विभूतिभूषण बंधोपाध्याय के दो उपन्यास
पाथेर पांचाली और अपराजितो के आधार पर सत्यजित राय ने तीन फिल्में पाथेर पांचाली, अपरजीतो औरे अपूर संसार बनाई। रवींद्र नाथ
के उपन्यास घरे बाइरे पर इसी नाम से फिल्म का निर्माण किया। रवींद्र के उपन्यास
नष्टनीड़ पर चारुलता, परशुराम की कहानी पर महापुरुष, शंकर के उपन्यासों पर क्रमशः सीमाबद्ध और जनअरण्य,
सुनील गंगोपाध्याय के उपन्यासों पर अरण्येर दिनरात्री और प्रतिद्वंदी तो इब्सन के
नाटक ‘एन इनमी ऑफ द पीपुल’ पर आधारित
गणशत्रु इत्यादि फिल्में बनाई। हिंदी में प्रेमचंद की शतरंज के खिलाड़ी और सद्गति
पर फिल्म बनाने से पहले उन्होने तमाम बांग्ला रचनाओं पर फिल्में बनाई। राय ने अपने
जीवनकल में बृत्तचित्र, फीचर फिल्में,
लघु फिल्में इत्यादि कुल मिलाकर सैंतीस फिल्मों का निर्देशन किया। अपनी मेहनत, लगन और काम के जरिये कुल बत्तीस राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी प्राप्त
किए।
पाथेर पांचाली ने भारतीय सिनेमा को एक अंतर्राष्ट्रीय पहचान
दी। अपने प्रदर्शन के कुछ ही दिनों में यह पूरी दुनिया में चर्चा का केंद्र बन गई।
हालांकि इस फिल्म की बहुत आलोचना भी हुई। कई फिल्म समीक्षकों एवं कलाकारों ने यहाँ
तक कहा कि सत्यजित राय ने इस फिल्म के जरिये भारत की गरीबी को बेचने का का काम
किया। वर्षों पहले मशहूर फिल्म अभिनेत्री नर्गिस ने भी कुछ ऐसा ही कहा था कि “सत्यजित
राय भारत की गरीबी को बेचकर दुनिया भर मे अवार्ड हासिल करते हैं।” इन तमाम
आलोचनाओं और खामियाँ निकालने वाले लोगो के मद्देनज़र एंडसे लिंडरसन ने लिखा कि “पाथेर
पांचाली जीवन की एक व्यापक महागाथा है। इसे कई दशकों बाद एक बार फिर से देखना
घुटनों धूल में चलकर भारतीय यथार्थ और मानवीय दशा के हृदय में उतरना है। विविधता
और खुलेपन में भारत की लज्जा नहीं बल्कि गौरव है जिसकी शिक्षा सत्यजित राय ने दी
है।” वास्तव में यह फिल्म भारतीय समाज का एक नग्न यथार्थ है। जिसे पूरी जीवंतता के
साथ पर्दे पर उकेरा गया। यह एक गरीब गाँव का सम्पूर्ण अनुभव है। जिसे भारतीय उपमहाद्वीप
के देश के पाँच लाख गवों का प्रतिनिधि माना जा सकता है। यहाँ गरीबी और भूखमरी की
चपेट में पड़े इंसान हैं। उनका अपना जीवन है। इसमें माँ की आंतरिक आदर्शवादिता और
जीवनसंघर्ष है। आज भी पाथेर पांचाली के उस निश्चिंदपुर की तरह इस उपमहाद्वीप के
तीन चौथाई विस्तार में हजारों गाँव हैं, जहां वास्तविक जीवन में भी ऐसा होता है। इस दृष्टि से निर्माण की आधी सदी
के बाद भी पाथेर पांचाली को देखना भारत के विपन्न गाँव का एक समग्र अनुभव है।
राय ने अपनी फिल्मों के लिए हमेशा प्रामाणिक भारतीय परिधि
को चुना। उनके काल और सौंदर्यबोध को फिल्म में घटित होते देखना एक विलक्षण अनुभव
है। श्रेष्ठ जीवन मूल्यों की रक्षा उनकी फिल्मों का प्रमुख तत्व है। यदि पाथेर
पांचाली, अपरजीतो और अपूर संसार को देखें तो वहाँ
गाँव है। अपरजीतो में बड़े होते बेटे और माँ के एकांतिक प्रेम का अंतर्विरोध है।
अपराजितो उपन्यास के उत्तरार्द्ध पर आधारित अपूर संसार संघर्ष की कहानी है। यहाँ
परंपरा से आधुनिकता तक सफर करता एक गरीब ब्राह्मण परिवार है। शतरंज के खिलाड़ी में
मुगल गौरव के अंततः अवसान से लेकर जलसाघर में सामंती जमींदार के पतन, जिसमें सामंती जीवनशिल्प के क्षय की कथा है। जहां विश्वंभर नामक चरित्र
एक आदर्शवादी दुनिया का पलायनवादी व्यक्तित्व है। फिल्म देवी में संभ्रांत वर्ग के
विवेक से एक नया समाज है तो चारुलता में कुलीनवर्ग के विवेक और बौद्धिक विचारों के
प्रति जागरूकता है। चारुलता की कहानी बंगाल के नवजागरण काल की है। जहां बदलते
सामाजिक दर्शन का प्रभाव साफ देखा जा सकता है। चारुलता में एक विवाहित स्त्री का
परपुरुष में अनुरक्त होना एक क्रांतिकारी धारणा है। महानगर भी स्त्री प्रधान फिल्म
है जहां नारी अपने जिंदगी की रह खुद चुनना चाहती है। अरण्येर दिनरात्री, प्रतिद्वंदी, सीमाबद्ध और जनअरण्य ये चारो राय की
ऐसी फिल्में हैं जिनमें राय ने अपने समकालीन जीवन को गहराई से समझने और उसे
यथास्थिति पर्दे पर उकेरने की कोशिश की है। राय के रचना संसार में अरण्येर
दिनरात्री तत्कालीन जीवन मूल्यों और नई पीढ़ी के युवाओं को समझने का पहला प्रयास
है। प्रतिद्वंदी में स्वतन्त्रता प्राप्ति के कई दशकों बाद बेरोजगार युवक का
आक्रोश है। जन अररण्य और शाखा प्रशाखा में भ्रष्ट समाज में सामाजिक चेतना की
अपरिहार्य मृत्यु तो सीमाबद्ध और उसके साथ की तीनों फिल्में कामकाजी दुनिया के
जरिये शिक्षित युवा वर्ग में कलकत्ता के जीवन के तनाव और मानसिक पीड़ा को समझने की
कोशिश करती है। समकालीन जीवन पर केन्द्रित राय की ये फिल्में नवोदित युग की और
कलकत्ता के मुक्त होते जीवन से जुड़ी थीं। यह नस्लवाद का वह दौर था जब वर्ग संघर्ष
बढ़ रहा था।
सद्गति में दुखी दलित ब्राम्हण के हाथों किस तरह प्रताड़ित
होता है और अंत में मर जाता है इसे बहुत ही मार्मिक ढंग से दिखाया गया है। वहीं
आशनी संकेत में जातिगत व्यवस्था के दलदल में जूझता परिवेश है। छूत-अछूत पर विमर्श
खड़ी करने वाली ये फिल्में भारतीय समाज का प्रतिविम्ब हैं। जिसके माध्यम से राय ने
समाज की जातिगत व्यवस्था पर प्रहार किया है। इस समय तक वह दौर सामने आ रहा था जब
लोग अपने आस-पास फैली असमानता और भ्रष्टाचार तथा सरकार की जनविरोधी नीतियों से
सचेतन हो रहे थे। राय की अंतिम तीन फिल्में मानवतावाद का पुरुजोर समर्थन करती हैं।
जहां शाखा प्रशाखा में सामाजिक मानोबृत्ति का मर जाना आवश्यक हो जाता है वही
गणशत्रु में धार्मिक कट्टरता और पतित राज्य के विरुद्ध संघर्ष है। अतिथि देवो भवः
की भारतीय संस्कृति का वीभत्स रूप आगंतुक में देखने को मिलता है।
राय ने साहित्यिक कृतियों के साथ बखूबी न्याय किया। मिशाल
के तौर पर राय की एकमात्र हिन्दी फिल्म शतरंज के खिलाड़ी को देखा जा सकता है। फिल्म
मुंशी प्रेमचंद की एक लघु कथा पर आधारित है। जो नवाब वाजिद अली शाह के समय के लखनऊ
की कहानी कहती है। यह वह दौर था भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का विस्तार हो चुका
था। राजनीतिक सत्ता एक हाथ से दूसरे हाथ सौपी जा रही थी। फिल्म थके-हारे सामंती ढ़ाचे की ब्रिटिश उपनिवेशवाद के
हाथों पराजित होने की त्रासदी का शुभारंभ करती है। यह फिल्म इस बात की पुष्टि करती
है कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद और भारतीय सामंतवाद दोनों ही प्रेमचंद की लेखनी के केंद्र
में रहे हैं। राय ने इस फिल्म के अंत को मूल साहित्य से अलग कर यह तथ्य स्थापित
करने की कोशिश की है कि नवाबी सभ्यता के खत्म हो जाने के बाद भी उसकी बुराइयाँ
समाज में जीवित हैं। शतरंज के खिलाड़ी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाली वह फिल्म है जो
भारतीय सामंतवाद और ब्रिटिश उपनिवेशवाद के संघर्ष की दस्तावेज़ है।
सार्वकालिक बनाने की कोशिश ही राय की फिल्मों को बड़ा बनाती
है। राय की फिल्मों का उल्लेखनीय तरीका जैसे भाषा की आवाज, शब्दों का खास चुनाव,
दृश्यों की जीवंतता विशेष प्रभाव या अर्थ पहुंचाता है। सिनेमा की संप्रेषणीयता से
वे भली-भाँति परिचित थे। वे इस बात से सरोकार रखते थे कि सिनेमा में गीतों, संवादों की भाषा चाहे जो भी हो वह अपनी संवेदना से ही विशाल जनसमूह तक
संप्रेषित होने की क्षमता रखती है। सिनेमा में भाषा के अलावा दृश्य का अपना महत्व
होता है। जिसमें एक सार्वजनिक अपील छिपी होती है। दृश्यों में निहित
प्रतिनिधिकताओं का संबंध उन मानव अनुभूतियों से होता है जिसको समझना किसी भी भाषाई, जातीय या क्षेत्रीय समुदाय के लिए कठिन नहीं होता। यही वजह थी कि भाषा
कभी उनकी फिल्मों के लिए अवरोध नहीं बनी। बल्कि गैर भाषाई दर्शकों तक भी सहज ही
संप्रेषित होती थीं।
राय ने समाज और संस्कृति में
व्याप्त जड़ता और कुरुतियों को पर्दे पर उकेर कर भारतीय जनमानस के उत्थान में न
सिर्फ अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई बल्कि दलितों एवं शोषित समाज के सवाल को
व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखकर सामाजिक न्याय एवं उत्तरदायित्व के प्रति जागरूकता
पैदा की। राय ने बतौर निर्माता निर्देशक व लेखक कई फिल्मों का निर्माण किया जो
उन्हें महान से महानतम बनाती है। राय आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से मानद (डाक्टरेड)
की उपाधि के साथ-साथ दादा साहब फाल्के और भारत रत्न जैसे श्रेष्ठ सम्मान भी प्राप्त
किए। उन्होने अपने समय के द्वंद व समस्याओं को न सिर्फ बंगाल परिप्रेक्ष्य में
बल्कि पूरे मानवीय गरिमा एवं समाज को ध्यान में रखकर उठाया है। राय अपने समय से
बहुत आगे थे। वे बीसवीं शताब्दी की महानतम फिल्म हस्तियों में एक हैं, जिन्होंने भारतीय
सिनेमा को विश्व में एक अलग पहचान दिलायी। सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण
विश्व उनके अविष्मरणीय योगदान के लिए उन्हें हमेशा याद रखेगा। पूरी दुनिया में
सार्थक सिनेमा की कोई भी चर्चा सत्यजित राय के बिना अधूरी रहेगी............
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