Friday, 29 March 2013

वैश्वीकरण के दौर में हिंदी पत्रकारिता

माधव राव सप्रे संग्रहालाय भोपाल की मासिक पत्रिका 'आंचलिक पत्रकार' में प्रकाशित....


भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, जो अब सूचना क्रांति का केन्द्र बन चुका है। भारत जैसे विकासशील देशों के विकास में पत्रकारिता की भूमिका महत्वपूर्ण है। पत्रकारिता सामाजिक गतिविधियों का आईना है। पत्रकारिता आज जागरूक समाज का अभिन्न अंग है। लोकतांत्रिक समाज में पत्रकारिता वह विशिष्ट विधा है जो आम आदमी के हितों की रक्षा करती है। पत्रकारिता के व्यापक सामाजिक एवं राष्ट्रीय उद्देश्य होते है। भारत में समाज निर्माण के क्षेत्र में पत्रकारिता ने अहम भूमिका का निर्वहन किया है। राजाराम मोहन राय, महात्मा गाधी, बालकृष्ण भट्ट, बाबूराव विष्णु पराड़कर, गणेश शंकर विघार्थी, केशवचन्द्र सेन, अजीमुल्ला खां, मदन मोहन मालवीय, इत्यादि विभिन्न समाज सुधारकों ने अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए पत्रकारिता का ही सहारा लिया।
        प्रेस जनता की वह संसद है जिसका अधिवेशन कभी समाप्त नही होता। यह एक वास्ततिकता है कि जहां प्रेस जनता का एक जागरूक प्रहरी होता है वहीं सरकार व जनता के मध्य एक विश्वसनीय संपर्क सूत्र की भूमिका निभाता है। दरअसल भारतीय परिप्रेक्ष्य में पत्रकारिता को ताकत स्वाधीनता आन्दोलन से मिलती है जहां न केवल उसकी जड़ें स्थित हैं बल्कि उसका उद्गम भी हुआ।
            हालांकि दुनिया में अख़बारी पत्रकारिता को अस्तित्व में आये लगभग चार सौ साल हो गयें हैं लकिन भारत में इसकी शुरूआत जेम्स आगस्टस हिक्की के बंगाल गजटसे हुई जो कलकत्ता से निकला था। आजादी के लड़ाई के दिनों से ही पत्र-पत्रिकाए स्वाधीनता के बड़े और व्यापक आंदोलनों के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक सुधारों, लड़ाइयों जैसे सती-प्रथा, जाति-भेद और छुआ-छूत उन्मूलन सहित विभिन्न मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ रही थी। राष्ट्रीय भावना को अभिव्यक्ति देने और राष्ट्र को एक साथ संघर्ष करने के लिए तैयार करने का महत्वपूर्ण कार्य प्रेस ने किया। वास्तव में प्रत्येक राष्ट्रीय कार्यक्रम, राष्ट्रीय संस्था की बात को जनसाधारण तक पहुचाने के सबसे बड़े और प्रधान साधन समाचार पत्र ही है। सन् 1947 तक पत्रकारिता का इतिहास क्रांति का इतिहास रहा है। ‘‘पत्रो की साधना से ही अपना राष्ट्र स्वतंत्र हुआ तथा हम विश्व मंच पर प्रतिष्ठित हुए।
                        हिंदी का फलक बहुत व्यापक है। वैश्विक भाषा फलक पर हिंदी का दूसरा स्थान है। बिगत् 50 वर्षो से हिंदी की विकास यात्रा पत्रकारिता, जनसंचार माध्यमों तथा हिंदी सिनेमा के साथ-साथ चल रही है। हिंदी ने अपना शब्द भण्डार भी बढ़ाया है। आज के समय की प्रमुख चुनौती है कि हिंदी हृदय की अभिव्यक्ति के साथ मस्तिष्क की जटिलताओं की तथा उन जटिलताओं से अद्भूत विज्ञान और तकनीक की संवाहिका बन सके। हिंदी ने इस क्षेत्र में भी हलचल मचाना शुरू कर दिया है। विज्ञान तकनीक, वाणिज्य तथा सूचना प्रौघौगिकी के क्षेत्र में हिंदी लगातार अपनी मजबूत पकड़ बनती रही है।
            भारत में बीसवीं शताब्दी व्यापक सामाजिक बदलावों की शताब्दी रही है। सदियों से चली आ रही अनेक परंपराओं तथा प्रथाओं में बदलाव इस सदी में देखने को मिलते है। पत्रकारिता ने हमेशा सामाजिक बदलावों का समर्थन तथा आधुनिक विचारों के प्रसार में सहयोग किया है। इसकी व्यापक एवं प्रभावी भूमिका के कारण ही इसे लोकतंत्र का चैथा स्तंभ कहा गया।
            हिंदी को भूमंडलीय पहचान देने में जनसंचार की अहम भूमिका है। संचार माध्यमों की भाषा के रूप में हिंदी की प्रगति दर्शनीय है। भाषा और समाचार का दायरा भूमंडलीय हो गया है। हिंदी दैनिकों का एक बड़ा पाठक वर्ग तैयार हुआ है। विश्व बाजार में भारतीय ग्राहकों की ओर नामी कम्पनियों का रुझान बढ़ा है। आज अंग्रेजीपरक चैनलों को भी भारत की जनभाषा के प्रभाव के साथ कदमताल करना पड़ रहा है। वर्तमान में बहुत सारे विज्ञान एवं तकनीकी से सम्बंधित चैनलो की भाषा में हिंदी का विकल्प मौजूद है। पिछले कुछ दशकों में तकनीकी ने प्रसार मीडिया को पूरी तरह बदल दिया है। इसके पहले हम टेलीविजन के नाम से जो कुछ भी जानते थे वह दूरदर्शन था । अब देश भर में 745 टी बी चैनल है उनमें से 366 समाचारों के है। भारतीय केबल नेटवर्क में हिंदी के मनोरंजन एवं संवाद चैनलो की भरमार है।
            हिंदी के प्रसार में जनमाध्यम सिनेमा की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। जिस प्रकार हिंदी उपन्यासो को पढ़ने के लिए लोग हिंदी सीखते थे, उसी प्रकार आज हिंदी सिनेमा को देखने-समझने के लिए लोग हिंदी सीख रहे है। आज दुनिया के कई देशों में बसे भारतीयों को जोड़ने का काम सिनेमा कर रहा है। आज के मध्यमवर्गीय एवं शहरी समाज की सम्पर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका श्रेष्ठ है।
            सूचना प्रौद्यौगिकी आज के संचार माध्यमों की रीढ़ बन गयी है। हिंदी के सभी दैनिक समाचार पत्र एवं पत्रिकाएं इंटरनेट पर उपलब्ध है। मौजूदा दौर में इंटरनेट पर 5000 से अधिक वेबसाइट हिंदी से संबधित है। वैश्विक पटल पर हिंदी की मजबूत पहचान बाजार में इसकी व्यवहार्यता तथा संचार माध्यमों द्वारा खुलकर इसके उपयोग के कारण संभव हुई है। सूचना प्रौद्यौगिकी के नित नए अविष्कारों ने हिंदी के साहित्यिक स्वरूप से आगे बढ़कर उसके प्रयोजन मूलक रूप को अधिक विस्तार दिया है। आज हिंदी भी एक उद्यम है। इस भूमण्डलीकरण एवं बाजारीकरण के दौर में हिंदी का रोजगार परक स्तर भी विकसित हो रहा है। आज हिंदी भी साइबर भाषा बनने के लिए अपनी सामर्थ्य दिखा रही है। बहुमाध्यम के रूप में सूचना प्रौद्यौगिकी ने जो साधन विकसित किये है, उन्होने हिंदी को भी नजरअंदाज  नही किया है। संचार माध्यमों के जरिये आज वैश्विक पटल पर हिंदी अपनी मजबूत उपस्थिति  दर्ज करा रही है।
            पत्रकारिता में रेडियो ने भी जनसंचार के एक सशक्त माध्यम के रूप में आगे आकर देश की सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, आर्थिक आदि क्षेत्रो की उन्नति में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। राष्ट्रीय तथा सामुदायिक विकास को बढ़ावा देना, लोगो के जागरूकता स्तर में वृद्धि करना, विकास योजनाओं की जानकारी गांव-गांव पहुचाना आदि काम रेडियो ने प्रभावशाली ढंग से पूरे किये है। खास ग्रामीण अंचल के उन क्षेत्रों में जहां बिजली, पानी, यातायात जैसी बुनियादी सुविधाएं नही पहुंच पायी रेडियो ने वहां पहुंचकर लोगों को देश दुनिया से जोड़ने का काम किया है।
            हाल के दशको में टीवी, रेडियो और समाचार उद्योग में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। पिछले कुछ वर्षों में जिन राज्यों में हिंदी के अलावा भाषायी अखबार शुरू हुए उन्ही राज्यों में क्षेत्रीय और भाषायी चैनल भी बढ़े। लकिन इसका टीवी या अखबारो के विकास पर कोई बुरा असर नही पड़ा। न तो दैनिक आखबारों की पाठक संख्या घटी और न ही प्रसार संख्या प्रभावित हुई। 1990 के दशक में जिस प्रकार प्रसार  माध्यमों की पहुच उपग्रह के प्रयोग से विश्वव्यापी बनी, उसके हम सभी साक्षी है।
आज भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग तेजी से फल-फूल रहे है। एक अध्ययन के अनुसार वर्तमान में चीन(13 करोड़) के बाद समाचार पत्रो की(9 करोड़) प्रतियां दुनिया में दूसरे नम्बर पर भारत में रोजाना प्रसारित होती है। आजकल अधिकांश मीडिया और उद्योग विशेषकर छोटे कस्बो में अपनी पैठ बनाने पर ज़ोर दे रहे है। दो साल पहले जारी नेशनल रीडरशिप सर्वे के रिपोर्ट के मुताबिक देश के 10 सबसे आधिक प्रसारित समाचार पत्रो में एक भी अंग्रेजी अखबार नही थे। इन दस अखबारों में पांच हिंदी के और बाकी सब अन्य भारतीय भाषाओं के थे। बावजूद इसके विगत डेढ़ दो दशक में भूमण्डलीकरण की आंधी दौड़ के कारण हिंदी मीडिया के स्वरूप और चरित्र में गुणात्मक बदलाव आया है। जो मीडिया पहले देशी सरोकारों व राष्ट्रीय भावनाओं का वाहक था वह लोकतांत्रिक मूल्यों की वजाय अब पूजीवादी हितों के अनुसार विचारों को ढालने की पूरी कोशिश कर रहा है। हिंदी के इलेक्ट्रानिक चैनल्स ही नहीं बल्कि प्रिंट मीडिया में अब अंग्रेजी के साथ भाषयी अखबारों में भी विदेशी पूंजी का निवेश तेजी से बढ़ रहा है।
            1980 के दौर तक हमारे प्रिंट या इलेक्ट्रानिक मीडिया पर देशी स्वामित्व था। लोग राष्ट्रीयता व देशभक्ति की भावना से ओत प्रोत समाचार पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन में लगे थे। 1990-91 के बाद इसकी स्थिति में काफी बदलाव आया है। आज अधिकतर निम्नवर्गीय या मध्यमवर्गीय घरों में टेलीफिल्म और उपग्रह टेलीविजन के कार्यक्रम देखे जा रहे है। इसमें जो सांस्कृतिक और राजनैतिक मूल्यबोध पैदा हो रहे है वह हिंदी पट्टी की जमीनी हकीकत से परे है। समाचारों के प्रस्तुतीकरण में भी बड़ा बदलाव आया है। फिटनेस, सौन्दर्य ज्वेलरी, माडल आदि की कवरेज ज्यादा हो रही है। आज हिंदी मीडिया से गम्भीर आर्थिक राजनीतिक व सामाजिक-सांस्कृतिक बहस खत्म होते जा रहे है। बड़े समाचार पत्रों की दिलचस्पी गम्भीर साहित्यिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक पत्रिकाओं के प्रकाशन में लगभग न के बराबर रह गई है ।
            इस वैश्वीकरण के दौर में हिंदी के इलेक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया पूंजीवाद के मददगार है। तेजी से उभरता भाषायी मीडिया भी आज बाजार के लिए अहम क्षेत्र बन गया है। पूजीवाद के दौर में आम आदमी सिर्फ एक उपभोक्ता बनकर रह गया है। समाज में व्याप्त दलित, आदिवासी, किसानों एवं महिलाओं से जुड़े सवालों को हिंदी मीडिया में भी प्रमुखता से नही उठाया जा रहा है। जनमाध्यमों की विकास मूलक भूमिका खत्म हो रही है। आज विज्ञापनों की कमाई से ही ये अपना अस्तित्व बनाए हुए है और उसी के आधार पर उनकी दिशा निर्धारित हो रही है।
            वैश्वीकरण या भूमण्डलीकरण जैसी अवधारणाएं उतनी नई नहीं है जितनी वे इन शब्दों में व्यक्त होकर लगती है। मानव समाज के समूचे इतिहास पर एक नजर डाली जाय तो ये अवधारणाएं काफी पुरानी है। एक उपनिवेश रह चुके देश के नागरिक के रूप में हमे वैश्वीकरण की बात कोई नई खबर नही लगती। फिर भी यह सच है कि बीसवीं सदी के आखिरी दशक में उठा वैश्वीकरण का नारा अपने साथ एक-दो नये तकनीकी साधन लेकर आता है। मुख्यतः एक इलेक्ट्रानिक्स, खासकर माइक्रोचिप पर आधारित उद्योगतंत्र, दूसरा  संचार व प्रसार जिसमे इलेक्ट्रानिक्स का प्रयोग शामिल है। तकनीक के इन दो दायरों में हुए बदलाव को प्रायः क्रान्ति का नाम दिया जाता है, यद्यपि इस क्रांन्ति का स्वरूप स्पष्ट नही है।
            संचार के संदर्भ में इलेक्ट्रानिक्स के इस्तेमाल का भारी असर दिखता है। पर संचार जिसमें व्यक्तिगत संदेश, प्रकाशन खासकर अखबार, टीवी, और इंटरनेट शामिल है। इनका दायरा बहुत विस्तृत है। इस परिवेश को चिन्हित करने के लिए हमें संदेशो व सूचनाओं को ले जाने वाली तकनीक के अलावा उन सामाजिक व राजनैतिक बदलावो को भी ध्यान में रखना होगा जो संदेशों की प्रवृत्ति पर असर डालते है।
            बीसवीं सदी के मध्य में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उभरी विश्वव्यवस्था को संचालित करने में सामूहिक पहचानों का योगदान पहले से भी अधिक रहा तो इस एक कारण को संचार के साधनों के इस्तेमाल में ढूढा़ जाना चाहिए। अखबार और टेलीविजन सरीखे शक्तिशाली प्रसार माध्यमों के प्रभुत्व में निजी पूजी और राज्यों के प्रतिबंधन की धूप-छाव वैश्वीकरण के वर्तमान और भावी स्वरूप की जॅाच के लिए एक जरूरी पृष्ठभूमि है, खासकर हमारी निगाह एक भाषा और उसका व्यवहार करने वाले समाज पर हो। हिंदी और हिंदीभाषी समाज पर आज पड़ रहे दबाव उस पुराने वैश्वीकरण के दौरान पड़े स्वरूपों से काफी भिन्न है जो उपनिवेशीकरण के रूप में विकसित हुआ था। दबाव ही भिन्न नहीं, वे परिस्थितियां भी काफी अलग हैं जिनमें आज हम वैश्वीकरण की चर्चा कर रहे हैं। वे इतनी भिन्न है कि हम यह भी नही तय कर सकते कि उनके लिए वैश्वीकरण शब्द का प्रयोग कितना उचित है।
            गांधी जी ने कहा है कि पत्रकारिता का उद्देश्य जनसेवा है। परन्तु आज वैश्वीकरण के दौर में हिंदी पत्रकारिता के वर्तमान स्थिति को देखते हुए हमे यह सोचने पर विवश होना पड़ता है कि पत्रकारिता का उद्देश्य जनसेवा है या निजी स्वार्थ की पूर्ति। यहां विज्ञापनों और समाचार के अंतर को समझना भी महत्वपूर्ण हो जाता है। इससे इनकार नही है की पत्रकारिता को बाजार की जरूरत नही है। बाजार की गैरमौजूदगी में संचार का कोई भी माध्यम जीवित नही रह सकता। बाजार होगा तो मीडिया भी रहेगा, लेकिन जब बाजार को जीवन दर्शन के रूप में मान्यता दी जायेगी तब मीडिया, समाज और राज्य के अन्तर्संबंधो का परिप्रेक्ष भी बदलने लगेगा। इन संबंधो का दिशानिर्देशन बाजार करेगा समाज के सरोकार नही।
            वैश्वीकरण के दौर में हिंदी पत्रकारिता पर यह सवाल और चुनौती है कि वह कैसे अपनी नैतिकता और अंतरात्मा को बचाते हुए जनता को विश्वास दिलाये कि पत्रकारिता जनता के हितों का रक्षक और सच्चा पहरेदार है। इस माहौल में स्वतंत्र और जनहित का ध्यान रखने वाली हिंदी पत्रकारिता को कैसे खड़ा किया जाय यह एक बड़ा सवाल है। कोई भी भाषा अपने समाज के मूल्य बोधों के सहारे ही टिकी होती है। लेकिन आज हिंदी पत्रकारिता में प्रोफेशनलिज्मजैसे शब्दों के नाम पर पत्रकारिता के मूल्य बोधों को कुचला जा रहा है। पत्रकारिता में प्रोफेशनल वह शब्द है जिसने विरासत और समाजिक सरोकार के बोध को, कुचल दिया है। हिंदी या भारतीय भाषाओं में इस तरह का शायद ही कोई शब्द तैयार हो सकता था। यह बात भी गौर करने लायक है कि जहां धर्मांधता और अंधविश्वास आदि के खिलाफ पत्रकारिता में किसी बहस की गुजांइश तक नही थी आज उसे प्रोफेशनलिज्म के नाम पर सरेआम बेचा जा रहा है और उसे ही खबर होने की संज्ञा दी जा रही है।
            इस तस्वीर के मद्देनजर हिंदी और भारतीय भाषाओं पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है कि वे वस्तुनिष्ठता बनाए रखे. किसी विशेष समुदाय, व्यवस्थित मत या सिद्धान्त का दामन थामने के बदले तटस्थ नज़र गड़ाए रखे । बाजार और उपभोक्ता संस्कृति का साथ देने के  बजाय सकारात्क और समाज को एक सूत्र में जोड़ने वाली घटनाओं और समाचारों को प्रमुखता दे और लगातार मानवीय समाज को आघात पाहुचने वाली घटनाओं की कवरेज के सिलसिले में पाठकों को उनके अधिकारों के सैद्धान्तिक और व्यवहारिक पहलुओं से अवगत कराते चलें।

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