जुलाई, प्रथम प्रवक्ता में प्रकाशित
भोजपुरी अपनी माटी से उपजी रसमयी बोली या भाषा है। हिंदी क्षेत्र की कई प्रचलित बोलियों में एक भोजपुरी भी है। यह न केवल दैनिक कार्य व्यापार में अपने क्षेत्र में समर्थ है बल्कि प्रवासी भारतीयों के मध्य भी एक मजबूत कड़ी के रूप में स्थापित है। भोजपुरी शुरू से ही जरिगर और जोरगर संस्कृति रही है। सरल, सहज, सरस व जीवंतता ही इसकी विशेषता है जिसके कारण यह रग-रग में प्रवाहित होने वाली संजीवनी बनी रहती है।
इधर कुछ सालों से विभिन्न संगठनों, संस्थाओं और राजनीतिज्ञों
द्वारा भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की लगातार मांग की जा रही है।
व्यापक स्तर पर यह मुहिम तब और तेज हो गई जब मैथिली, बोडो, संथाली और डोगरी को
बोली से भाषा बनाकर संबिधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया गया। हालाकि 2006
में प्रस्ताव लाया भी गया था। तत्कालीन गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जयसवाल ने
कहा था
कि अगले ही सत्र में इसका विधेयक लाया जाएगा।
तब 2007 में यूपीएससी परीक्षा की भाषाओं का निर्धारण हो जाने तक के लिए इसे ठंडे
बस्ते मे डाल
दिया गया। हाल ही में
जब मार्च में यूपीएससी की रिपोर्ट आयी
तो इस मुहिम
का ज़ोर
पकड़ना स्वाभाविक था।
लोकसभा में यूपी, बिहार और कुछ अन्य
सांसदों का
भोजपुरी को लेकर आक्रामक तेवर देख कांग्रेस
अध्यक्ष सोनिया गांधी
के
निर्देश देते ही गृहमंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि सरकार सीताकांत महापात्रा और संघ लोक सेवा आयोग की उच्चस्तरीय
समिति की
रिपोर्ट पर विचार करने के बाद अपना निर्णय मानसून सत्र में
बताएगी। इतना
ही नहीं कभी हिंदी न बोलने वाले चिदंबरम ने भोजपुरी में दो शब्द बोलकर काफी वाहवाही लूटी। अब देखना
यह है कि लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के अनुसार
अगला
मानसून सत्र खुशखबरी वाला होगा या राजनीतिक आँख मिचौली का।
किसी भी बोली को भाषा बनाने से पहले उसके सभी
पक्षों पर विचार कर लेना
उचित
होता है। इसके आंतरिक और वाह्य दो मुख्य पक्ष होते
हैं।
पहले के अंतर्गत सवाल यह उठता है कि क्या भोजपुरी शासन-प्रशासन के कार्यों को
करने में
सक्षम है? भोजपुरी
की अपनी कोई
लिपि, कोश-ग्रंथ
या कोई
मानकीकृत
व्याकरण है? उसकी साहित्य परंपरा कितनी समृद्ध है? दूसरे पक्ष में हमें इस बात पर विचार करना होगा
कि भोजपुरी को भाषा क्यों बनाया जाय? उसके बोलने वालों की संख्या कितनी है?
जहां तक भोजपुरी का प्रश्न
है तो
प्राचीन काल से ही भोजपुरी क्षेत्र का इतिहास एवं उसकी परंपरा समृद्ध
और गौरवशाली रही है। ऋषि-महर्षि, विद्वान, कलाकार राजनीतिज्ञ तथा इस धरती के वीरता की समृद्ध विरासत
से
इतिहास भरा पड़ा है। हालाकि भोजपुरी साहित्य का क्रमबद्ध इतिहास प्रस्तुत
करना आसान
कार्य नहीं है। यह ज़्यादातर मौखिक रूप में ही विद्यमान है। लिखित साहित्य अधिकतर
पद्य रूप में हैं जिनमें सर्वाधिक गीतों का संग्रह है।
लोक गीत, लोक कथा एवं लोक गाथाओं के रूप में इसके साहित्य प्रचुर परिणाम में उपलब्ध
हैं जिसका संकलन कर इसके साहित्य का एक बड़ा कोश तैयार किया जा सकता है।
संत कवियों एवं तुलसी, जायसी आदि अवधी के कवियों ने भी भोजपुरी संज्ञा, शब्दों एवं कहीं-कहीं क्रिया पदों का प्रयोग किया है। इन कवियों
में कबीर का सर्वश्रेष्ठ स्थान है। भोजपुरी बोली का सबसे
प्राचीन
नमूना इन्हीं की कविता में मिलता है। धरमदास
की रचनाओं में
भी भोजपुरी क्रियाओं का स्पष्ट उदाहरण मिलता है। संत परंपरा
के कवि शिवनारायण
ने कई
हस्तलिखित ग्रन्थों की रचना भोजपुरी में की है। प्रसिद्ध कवि लक्ष्मी सखी के
ग्रंथो में भी इसके काफी उदाहरण मिलते हैं।
ऐसे
अनेकों प्रमाण संत कवियों के ग्रंथ और उनकी रचनाओं में भरे पड़े हैं।
अगर भोजपुरी साहित्य के संदर्भ में
इन सवालों का उत्तर खोजने की कोशिश की जाय तो हमें सबसे पहले मुगल काल और ब्रिटिश
हुकूमत की तरफ देखना पड़ता है। हमें प्रमाण के तौर पर उन्हीं दस्तावेजों को खंगालना
पड़ता है जिसे उन्होने अपनी जरूरत, अभिप्राय और तरकीब से लिखा। यद्यपि इस
बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि उनमें से कुछ भाषा प्रेमियों ने भोजपुरी के
लिए महत्वपूर्ण काम किया। जिसे आज भोजपुरी का प्रामाणिक दस्तावेज़ माना जाता है।
निश्चित तौर पर इसमें जार्ज ए ग्रियर्सन
का नाम सबसे पहले आता है जिन्होंने भोजपुरी लोक गीतों के संग्रह और प्रकाशन हेतु
बहुत काम किया है। आल्हा के विवाह गीत, आल्हा बध आदि तमाम लेख एवं किताबें
भोजपुरी के संदर्भ में प्रकाशित करायी। इनके अलावा ह्यूज़ फ्रेचर के भोजपुरी गीतों
का संग्रह,
ए जी शिरेफ द्वारा संपादित पुस्तक हिन्दी फोक सॉंग, जे कीम्स के लेख
इत्यादि भोजपुरी की महत्वपूर्ण तहरीर है।
भारतीय लोगों
में भोजपुरी के कवि विसाराम की रचनाएँ, कवि तेग आली की रचना बदमाश दर्पण, बाबू
राम कृष्ण वर्मा की साहित्यिक पुस्तक विरह नायिका भेद, पंडित
दूधनाथ उपाध्याय की प्रथम महायुद्ध के दौरान लिखी पुस्तिका भारती के
गीत,
उनकी रचना भूकंप पच्चीसी, अंबिका प्रसाद के
भोजपुरी के गीत, भिखारी
ठाकुर का नाटक बिदेसिया, मनोरंजन सिन्हा की कविता फिरंगिया, श्याम
देहाती का देहाती दुलकी, रामविचार पांडे की बिनिया बिछिया
इत्यादि रचनाएँ भोजपुरी साहित्य की तमस्सुक है। भारत के बाहर मरीशस में ब्रजेन्द्र कुमार भगत का मधु कलश, नंदलाल की सरल गीता, रामनाथ का सनातनीय विवाह के गीत, सुचिता रामदीन की संस्कार मंजरी, मरीशस मे डॉ सरिता बुद्धू, नीदरलैंड में पुष्पिता अवस्थी, फीजी में विवेकानंद
वर्मा, थायलैंड में मोहन के.
गौतम
इत्यादि रचनाकर एवं रचनाएँ विश्व स्तर पर भोजपुरी साहित्य को
समृद्ध
कर रहे हैं।
प्राप्त दस्तावेजों के
आधार यह तर्कसंगत नहीं लगता कि भोजपुरी सिर्फ एक बोली है भाषा नहीं इसलिए इसे
आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया जा सकता। इसके
बोलने वालों की संख्या पे भी गौर किया जाय तो भोजपुरी एशोशिएशन ऑफ इंडिया के
आंकड़ों के मुताबिक भोजपुरी विश्व के पाँच महादेशों में 18 करोड़ से अधिक लोगों की
भाषा है और विश्व में बोली जाने वाली भाषाओं में इसका दसवां स्थान है।
यहाँ एक सवाल
और उठता
है कि मैथिली, बोडो, संथाली, और डोगरी को आठवीं अनुसूची
में
शामिल किया गया है तो भोजपुरी को क्यों नहीं? क्या इन सभी के भाषा, साहित्य और बोलने वालों
की
संख्या भोजपुरी से समृद्ध है? इन सवालों पर विचार करें तो बोडो, संथाली, डोगरी, भले ही इन भाषाओं के बोलने वालों की संख्या
सीमित है लेकिन यह एक समुदाय विशेष की भाषा है। अभी
इन्हें संरक्षित करने और पर्याप्त सरकारी सहयोग
की जरूरत
है। अतः इन्हें आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाना
वाजिब है।
जहां तक मैथिली और भोजपुरी की बात है तो भोजपुरी संख्यात्मक दृष्टि
से बिहार की मैथिली एवं मगही इन दोनो बोलियों के भाषियों की सम्मलित संख्या से कहीं
अधिक है। अब तर्क यह उठता है कि मैथिली का साहित्य समृद्ध है। लेकिन
वर्तमान
में भोजपुरी, भाषा
और
साहित्य रचना की दृष्टि से मैथिली से कहीं भी कम नहीं है।
यहाँ तक कि कई विश्वविद्यालयों जैसे इग्नू, नालंदा, बीएचयू, आदि में इसके एम ए, डिप्लोमा, एवं सर्टिफिकेट कोर्स भी
चलाये जा
रहे हैं ।
इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद यह कहीं
से जायज़
नहीं लगता कि भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया जाना चाहिए। अब
यहाँ सबसे बड़ा और प्रमुख सवाल यह खड़ा होता है कि भोजपुरी अगर भाषा बन गई तो क्या
हिंदी कमजोर हो जाएगी? हिंदी राष्ट्रभाषा के लिए जो संघर्ष कर
रही है,
क्या वह संघर्ष कमजोर पड़ जाएगा ? भोजपुरी के बाद ब्रज, अवधी, आदि हिंदी की
बोलियों को भी भाषा बनाने का आंदोलन अगर खड़ा हुआ तो क्या हिंदी राजभाषा भी रह
पाएगी?
ये महत्वपूर्ण प्रश्न हैं जिसपर हम सभी को गंभीरता से विचार करना होगा।
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