Tuesday, 14 August 2012

फइलत शाखा के कमजोर होत जड़

लखनऊ से प्रकाशित भोजपुरी का साप्ताहिक पत्र भोजपुरिया अमन में प्रकाशित
 
भोजपुरी मुख्यत: हिन्दी भाषी प्रदेश, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार तथा झारखण्ड में बोले जाये वाला एगो लोक भाषा हवे । भोजपुरी बोले वाला बहुत से लोग प्रवासी भारतीय बाड़े जे कि विश्व के कई भाग गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद फिज़ी, पोलैंड, मारीशस, नेपाल आदि देश में जा के रचल-बसल बाड़े ।
हजारों मील दूर बसल मारीशस अउर भारत के भोजपुरी ही जोड़ेला । एकर सबसे बड़ प्रमाण इ बा कि इहाँ के दो तिहाई आबादी के जन भाषा भोजपुरी हवे । इ भोजपुरी भाषी ब्रिटिश सरकार द्वारा थोपल गईल करनामा के तहत बधुआ श्रमिक (गिरमिटिया मजदूर)बन के पूर्वी भारत से मारीशस आईल रहले । धीरे-धीरे इहे भोजपुरिया लोग बहुसंख्यक होके आज सत्ता में आ गइले । मारीशस में भोजपुरी भाषा के राजकीय मान्यता के संदर्भ में एगो ऐतिहासिक व राजनैतिक फैसला एह भारतीय मूल के लोगन के भोजपुरी के प्रति लगाव के प्रति एगो नायाब उदाहरण बाटे । इहाँ इ प्रभाव भोजपुरी फिल्म के लोकप्रियता से बयां हो रहल बा ।
 
सिनेमा बीसवीं शताब्दी के एगो महत्वपूर्ण देन हवे । आज हर विचारशील व्यक्ति एकरा सम्मोहन अउर प्रभाव से परिचित बा । सिनेमा एगो अइसन सशक्त माध्यम ह जे जनसाधारण के जीवन के संपूर्ण दर्पण हवे ।
 
भोजपुरी सिनेमा आज विश्वपटल पर एगो नया आयाम रच रहल बा । पिछ्ला पचास साल में एहमा बहुत उतार चाढ़ाव आईल लेकिन हर परिस्थिति से जुझत आज भोजपुरी संस्कृति के प्रचार प्रसार पूरी दुनिया में कर रहल बा । भोजपुरी सिनेमा के प्रथम अध्याय साठ के दशक में शुरु भईल,जब आरा भोजपुर के विश्वनाथ साहाबादी के पहिला भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबो’ प्रदर्शित भईल । हिन्दी भाषी दर्शकन के भोजपुरी के मिठास से परिचित करावे में अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन के भूतपूर्व अध्यक्ष मोती बीए क बहुत बड़ योगदान रहल । सन 1948में किशोर साहू के निर्देशन में ‘नदिया के पार’ नामक एगो फिल्म बनल जेकर संवाद अवधी भाषा मे रहे । एह फिल्म के गीत मोती बीए द्वारा भोजपुरी मे लिखल गइल रहे । एह गीतन के अविश्वस्नीय रुप से एतना लोकप्रियता मिलल की एकरा बाद से ज्यादातर हिन्दी फिल्मन में एगो भोजपुरी गीत रखे क रिवाज सा चल पड़ल । लोगन के हिन्दी फिल्म में भोजपुरिया गीत अउर एकर मिजाज बड़ा अच्छा लागल । नतीजन हिन्दी सिनेमा में भोजपुरी के जोरदार तड़का लागे शुरु हो गइल । बावजूद एकरा कउनो भी फिल्मकार एगो सम्पूर्ण भोजपुरी फिल्म बनावे के जोखिम नही लेहल चाहत रहले ।

16फरवरी 1961 के हिन्दी सिनेमा के स्थापित कलाकार नासिर हुसैन के नेतृत्व में भोजपुरी के पहिला फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चड़इबो’के योजना बनल । फिल्म के निर्देशन बनारस के कुन्दन कुमार अउर संगीत क जिम्मेदारी चित्रगुप्त अदा कइले । 16फरवरी 1962के बिहार के राजधानी पटना के शहीद स्मारक पार्क पर आज के बिशाल भोजपुरी फिल्म उद्योग के नींव रखल गईल। पचास साल पहिले कभी बिहार अउर यूपी के बजार के ध्यान में रख के बने वाली भोजपुरी फिल्म आज देश से बाहर विदेश के धरती पर भी आपन झण्डा गाड़ रहल बा ।

पहिला भोजपुरी फिल्म के गीत पूरा भोजपुरिया क्षेत्र के गांव-गांव में गुंजे लागल । मात्र पांच लाख के पूंजी से बनल इ फिल्म ओह जमाना में लगभग पचहत्तर लाख के व्यवसाय कइलस । एही दशक में भोजपुरी के शेक्सपीयर भिखारी ठाकुर के कृति ‘बिदेशिया’पर आधारित एही नाम से फिल्म बनल । एह फिल्म के मार्मिक अउर भावपूर्ण दृश्य क लोगन के दिल पर बड़ा गहरा असर पड़ल । इ दूनो फिल्म ओह समय के समाज में व्याप्त कुरितियन के ध्यान में रखके बनल रहे । जहां ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबो’ में संभ्रांत वर्ग के विवेक से बनत एगो नया समाज त ‘विदेशिया’ में जातिगत व्यवस्था के दलदल से जुझत परिवेश के बहुत ही सुक्ष्मता से पर्दा पर उकेरल गईल । एकरा बाद भी एह तरह के फिल्म के सिलसिला जारी रहे ।
 
सत्तर के दशक के अंत में विदेशिया के निर्माता बच्चू भाई शाह भोजपुरी के पहिला रंगीन फिल्म ‘दंगल’ बनवले । एह फिल्म के पात्र अउर कथानक लगभग वइसही रहले लेकिन रंग के अलावा मिस इंडिया प्रेमा नारायाण एह फिल्म में व्यक्तिगत आकर्षण के केन्द्र रहली । इ उ दौर रहे जब भारतीय फिल्म फलक पर शोले जइसन हिट फिल्म अकर जा चुकल रहे । नदीम श्रवन के जोड़ी के बेहतरीन संगीत के साथ भोजपुरी फिल्म में गीत के सशक्त जमीन के बावजूद मसाला मिलावे के चलन एहिजे से शुरु हो गइल । भोजपुरी सिनेमा के मौलिकता से नकल के ओर ले जाये में दंगल के प्रमुख योगदान रहल । दंगल से उत्प्रेरित होके नासिर हुसैन राकेश अउर पदमा खन्ना के शिर्ष भूमिका में लेके,अंजान और चित्रगुप्त के संगीत से सुसज्जीत फिल्म ‘बलम परदेशिया’के निर्माण कइले । इ फिल्म रजत जयंती मनावे में सफल रहल । चित्रगुप्त के संगीत और आशा भोसले के साथ मोहम्मद रफी के आवाज में फिल्म के एगो गीत गोरकी पतरकी रे मारे गुलेलवा जियरा उड़ि-उड़ि जाय से भोजपुरिया गली गुलजार हो गइल । एकरा तुरंत बाद अशोक चन्द्र जैन के फिल्म गंगा किनारे मोरा गांव बनल । पटना के अप्सरा सिनेमा हाल में तीस सप्ताह और मुम्बई के मशहुर मिनर्वा सिनेमा हाल में चार सप्ताह तक इ फिल्म हाउस फुल चलल । एह फिल्म के जरिये भोजपुरी के कउनो पहिला फिल्म के प्रदर्शन मारीशस में भईल। अस्सी के दशक के बाद से भोजपुरी सिनेमा के बुरा दौर शुरु हो गइल ।
 
नया सदी के शुरुआत में भोजपुरी सिनेमा नया करवट लेहलस और व्यावसायिकता के आधार पर फिल्म के निर्माण शुरु भइल । लम्बा समय बाद 2003में मोहनजी प्रसाद रवि किसन के ले के ‘सईयां हमार’ अउर एकरा तुरंत बाद मनोज तिवारी के साथ ‘ससुरा बड़ा पइसा वाला’ नाम के फिल्म बना के भोजपुरी फिल्म जगत के स्वर्णीम युग के शुरुआत कइले। मात्र तीस लाख के बजट से बनल फिल्म ससुरा बड़ा पइसा वाला लगभग पन्द्रह करोड़ के कमाई कइलस । भोजपुरी सिनेमा क इतिहास में पहिला बार कवनो भोजपुरी फिल्म के एतना बड़ सफलता मिलल रहे । एह फिल्म द्वारा भोजपुरी सिनेमा क तीसरा दौर के जन्म भइल,जेवन बाजार के दृष्टि से नया संभावना के जन्म देत रहे । एकरा बाद से भोजपुरी फिल्म जगत में उफान सा आ गइल । ‘पंडितजी बताई ना बियाह कब होई,बन्धन टूटे ना, दरोगा बाबू आई लभ यू,निरहुआ रिक्शा वाला’आदि फिल्म खुब धूम मचवलस अउर इ सिलसिला बदस्तुर जारी बा । विशुद्ध रूप से इ सब मनोरंजक फिल्म रहे जेमा आम बालीवुड फिल्म के तरह मसाला के साथ साथ लच्छेदार भाषा और मनोरंजक गीत के भरपूर इस्तेमाल कइल गइल ।

2003के नया दौर के भोजपुरी फिल्म से भोजपुरी के मिठास गायब होखे लागल । फिल्म के चरित्र और स्वरूप में गुणात्मक बदलाव भइल । एह व्यावसायिकता के दौर में भोजपुरी समाज के समस्या, लोक संस्कृति, लोक परंपरा के चित्रण भी व्यावसायिक नजरिया से होखे लागल । आज के दौर के भोजपुरी सिनेमा में भाषा के अगर छोड़ दिहल जाय तो सब कुछ बदल गइल बा । भाषा सिर्फ एगो भाषा ना होला बल्कि उ समाज के एगो अंग और सभ्यता के प्रतिनिधि भी होला । आज भोजपुरी फिल्म के कहानी के बात करीं त सीधा-सीधा हिन्दी फिल्म के नकल धड़ल्ले से जारी बा । संस्कृति गौड़ और व्यवसाय प्रमुख हो गइल बा ।

पहिला दौर के फिल्म पे गौर कइल जय त सिनेमा के कहानी, परिवेश, कलाकार, गीत-संगीत इत्यादि हर एक पक्ष भोजपुरी के आपन रहल । फिल्म के विषय-वस्तु शुरू से ही गाँव से जुडल रहल बा । आमतौर पर घर–घर मे घटित होवे वाली घटना जइसे आपसी संबंध,घरेलू विवाद,भाईचारा, भावनात्मक-रिश्ता,विवाह संबंध, दहेज, जातिगत भेद-भाव आदि फिल्म के कथानक के विषय वस्तु रहल। आज़ादी के बाद भारत में आइल सामंतवादी और जमींदारी प्रथा के प्रभाव तथा प्रवासी मज़दूरन के समस्या भोजपुरी फ़िल्मकारन के पसंदीदा विषय रहल। फिल्म में भले ही एह विषय के मसाला के रूप मे इस्तेमाल कइल गइल लेकिन आम जनमानस में एकर संदेश अद्वितीय रहे । ओह दौर के फिल्म में भोजपुरी अंचल के गाँव और संस्कृति के बहुत ही सूक्ष्मता से दर्ज़ कइल गइल पर आज के दौर के फिल्म मे एकर सर्वथा अभाव बा।
 
एगो समय रहल जब भोजपुरी फिल्म के विषय वस्तु प्रस्तुति और प्रदर्शनधर्मिता देहात से संपृक्त होत रहे और जनसामान्य के प्रति लाखो निरक्षर लोगन के गहनतम संवेग के दृष्टि से गीत और नाटक के माध्यम अद्वितीय होत रहे । आज एह व्यवसायिकता के दौर में भोजपुरी गीत-संगीत अश्लीलता के चपेट मे आ गइल बा। कर्णप्रिय संगीत के जगह द्विअर्थी गाना के प्रधानता बा। फिल्म निर्माता भी सामाजिक सरोकार के छोड़कर सिर्फ लाभ खातिर फिल्म बना रहल बाड़े । अइसे में एक तरफ जहां भोजपुरी फिल्म के बाजार बढ़ रहाल बा ओइजे दूसरा तरफ इ आपन निश्चित लक्ष्य से भटक रहल बा । एक हद तक नैतिक वर्जना के अतिक्रमण हो रहल बा। यथार्थ के जगह नाटकीयता,भव्यता अऊर अतिरंजित नायकत्व के घाल-मेल से भोजपुरी सिनेमा लोगन के चमत्कृत कर रहल बा। आरंभ मे एकरा द्वारा समाज के मान्यता के अनुपालन त भइल लेकिन आज हिंसा, अपराध, अश्लीलता,उपभोक्तावादी रुझान, आडंबरपूर्ण जीवन शैली आदि के बढ़ावा दिहल जा रहल बा। जेकर समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहल बा।
 
आज भोजपुरी सिनेमा एगो खास तरह के धारा में ठहर गइल बा। ओके खुद के हिन्दी के प्रभाव से मुक्त होखे के पड़ी और विषय-वस्तु के खातिर आपन जमीन से जुड़े के पड़ी । आज पहिले क अपेक्षा फिल्म ज्यादा बन रहल बा लेकिन दु:ख बा कि एकर अस्तित्वे दाव पर लगल बा । समय के साथ बदलाव जरूरी बा लेकिन निश्चित सीमा में । दर्शक के रुचि हेतु सार्थक फिल्म बानवे के पड़ी, ताकि एकर चर्चा दूसरा भाषा के लोगन के बीच भी होखे जेसे एकर एगो राष्ट्रीय पहचान बने। तबे एकर दर्शक वर्ग बढ़ी अउर सफलता के इ स्वर्णिम दौर टिकाऊ रह पाई।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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