Thursday, 9 August 2012

मीडिया में दलित हिस्सेदारी का प्रश्न

किसी भी देश के विकास का तात्पर्य केवल बड़े-बड़े उद्योग, चौड़ी सड़कें और उनपर दौड़ते हुए वाहनों से नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व शैक्षिक आदि के साथ-साथ संपूर्ण विकास से होता है । यह विकास तभी मुमकिन होता है जब वैचारिक परिवर्तन होता है । इस परिवर्तन को जनसंचार माध्यमों के द्वारा ही संभव बनाया जा सकता है । आज परिवर्तन की जो सशक्त धारा समाज में बह रही है उसमें मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण है ।
आज मीडिया बाजार के लिए एक अहम क्षेत्र बन गया है । मीडिया पर बाजार की गिरफ्त बढ़ती जा रही है। इस बाजारू व्यवस्था में दलित समेत सभी कमजोर जमातों को मीडिया में उचित जगह मिल पाना मुश्किल होता जा रहा है । 1990-91 के बाद मीडिया के संपूर्ण परिदृष्य पर एक नजर डाली जाए तो आज उसकी स्थिति में काफी बदलाव आया है । मीडिया से गंभीर, आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक - सांस्कृतिक बहस एवं समाज से जुड़े सभी जरूरी मसले अपना स्थान खो चुके हैं । समाज में व्याप्त दलित, आदिवासी व किसानों के ज्वलंत सवालों को मीडिया में नहीं उठाया जा रहा है।
एक नज़र समूचे मीडिया परिदृश्य पर डाली जाय तो दलितों को प्रतिनिधित्व या उनकी खबरों को वाजिब जगह देने को लेकर निजी और सरकारी मीडिया दोनों की प्राप्य स्थिति निराशाजनक है । यह बात पहले हुए अध्ययनों से भी खुलकर सामने आती है । 1996 में अमेरिकी समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट के नई दिल्ली ब्यूरो प्रमुख कैनेथ कपूर द्वारा किए गए एक शोध में यह तथ्य सामने आया कि भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय से मान्यता प्राप्त पत्रकारों की सूची में एक भी दलित नहीं है ।
आज हम दलित समुदाय की बातों पर ध्यान दें तो पता चलता है कि उन्हें लोकतंत्र और संविधान से बनी व्यवस्थाओं से कहीं ज्यादा शिकायतें मीडिया से है । पत्रकारिता में अब तक की  जो सबसे बड़ी कमियां रहीं हैं, उनमें कमजोर जमातों की आवाज को  उनके बाजिव हक से वंचित रखना प्रमुख है । यह स्थिति तब है जब भाषाई मीडिया की पैठ जिन समूहों में सबसे तेजी से बढ़ रही है और जहां उसके विस्तार की सबसे ज्यादा संभावनाएं दिखती हैं वह दलित और कमजोर वर्ग का ही है । देखा जाय तो भारतीय समाज में कमजोर, उपेक्षित, और प्रताड़ित समुदायों की कमी नहीं है। पर इन सभी समूहों में आंतरिक, सामाजिक व राजनैतिक चेतना की आवाज़ किसी की सबसे अधिक बुलंद हुई है तो वह दलित और कमजोर वर्ग की । पिछले दो-तीन दशक में पूरे मुल्क में जो बड़ा सामाजिक, राजनैतिक बदलाव हुआ है उसके अगुआ भी पिछड़े और दलित ही है।     
गांधी जी ने कहा है कि- पत्रकारिता का उद्देश्य जनसेवा है । अतः मीडिया को अपनी नैतिकता और मूल्यों को ध्यान रख, समाज के रचनात्मक विकास को प्रोत्साहन देते हुए विभिन्न धर्मों, जातियों एवं संस्कृतियों के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते हुए सामाजिक, सांस्कृतिक एकता की दिशा में वर्तमान पत्रकारिता को विशेष रूप से आगे बढ़ाना होगा ।

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